भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप नोट्स – प्रारंभिक प्रतियोगिता परीक्षा के लिए

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भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप

  • अंग्रेजों से पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति ग्रामीण तथा अविकसित थी। गांव एक पृथक इकाई थी तथा व्यवसाय वंशानुगत था। यहां का प्रमुख व्यवसाय कृषि था, लेकिन उद्योग के क्षेत्र में भी यह उन्नत था। भारत द्वारा उत्पादित रेशमी व सूती वस्त्र, विश्व में उत्तम क्वालिटी के माने जाते थे। यहां संगमरमर का कार्य, नक्काशी का कार्य, सोने-चांदी के आभूषण व पत्थर पर तराशी का कार्य बहुत ही उत्तम किस्म का होता था। अतः इनका निर्यात किया जाता था। निर्यात की वस्तुओं में नील, अफीम व मसाले भी शामिल थे। इस प्रकार सत्रहवीं व अट्ठारहवीं शताब्दियों तक भारतीय अर्थव्यवस्था अपने परंपरागत स्वरूप में गतिमान रही।
  • अंग्रेजों ने भारत पर न केवल राज्य किया, बल्कि इसको एक उपनिवेश बना दिया। ‘उपनिवेश’ का अर्थ है कि इस देश को किसी प्रकार की राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी तथा इसकी आर्थिक गतिविधियों पर उनका सीधा नियंत्रण था। भारत पर 1757 से 1858 ई. तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने तथा इसके बाद 1858 से 1947 तक ब्रिटिश सरकार ने शासन किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी, अल्पविकसित, गतिहीन व सुस्त अर्थव्यवस्था थी।
  • किसी भी देश का विकास उस देश की कृषि एवं उद्योग पर आधारित होता है। कृषि के लिए शक्ति, साख, परिवहन आदि चाहिए, तो उद्योग के लिए मशीनरी, विपणन सुविधा, परिवहन, संदेशवाहन आदि। यदि कोई देश तेजी से विकास करना चाहता है, तो उसे इस आधारभूत ढांचे में निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा- (1) शक्ति कोयला, ईंधन, तेल, सौर ऊर्जा, वायु आदि। (2) परिवहन – इसमें रेल, सड़कें, पोत व वायु परिवहन आदि । (3) संदेशवाहन डाक, तार, टेलीफोन, रेडियो, बेतार का तार आदि । (4) बैंक, वित्त व बीमा, (5) विज्ञान व तकनीक व (6) कुछ सामाजिक मद, जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आते हैं, को बढ़ाना पड़ेगा। स्वतंत्रता के समय उपरोक्त सभी आधारभूत ढांचे की कमी थी।
  • स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रिटेन की एक कॉलोनी का रूप ले चुकी थी । कृषि उत्पादन में कमी थी, किसान गरीब थे, कृषि उत्पादकता विश्व में सबसे कम थी। संगठित उद्योग थोड़े थे, लेकिन बड़े शहरों में केंद्रित थे, भारी एवं आधारभूत उद्योग नहीं थे। यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक पहलू उसके अल्पविकसित स्वरूप का बोध कराता है, किंतु नियोजन काल की अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप में कुछ मूलभूत परिवर्तन हुए हैं, जिनके आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था को विकासोन्मुख कहा जा सकता है।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में आर्थिक नियोजन को विकास का आधार बनाया गया है। सभी योजनाओं का प्रमुख एवं मौलिक उद्देश्य देश में समन्वित एवं संतुलित विकास को प्रोत्साहित करना रहा है। नियोजन काल में कृषि, उद्योग, व्यापार सभी क्षेत्रों में विकास के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए तथा भारत की गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने का प्रयास किया गया। नियोजन काल में भारतीय अर्थव्यवस्था का संस्थागत ढांचा पर्याप्त रूप में विकसित हुआ है। बढ़ता सार्वजनिक विकास व्यय, बैंक एवं बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण, ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़क एवं रेल परिवहन का विकास, कृषि का मशीनीकरण एवं हरित क्रांति, औद्योगिक विस्तार, बढ़ती शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं आदि अनेक विकासोन्मुख घटक हैं।
  • भारतीय नियोजन अवधि में अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में उत्पादन में पर्याप्त विकास हुआ है। नियोजन काल में कृषि उत्पादन बढ़ा है, आधारभूत उद्योगों की स्थापना हुई है। लोहा, इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, रसायन, उर्वरक आदि सभी उद्योगों का नियोजन काल में तीव्र विकास हुआ है, जिससे भारत का आयात कम हुआ है और विदेशी निर्भरता में कमी आई है। भारतीय नियोजन के मौलिक उद्देश्यों में समाजवादी अर्थव्यवस्था की झलक मिलती है। समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता एवं शोषण को समाप्त करने के लिए नियोजन काल में अनेक कदम उठाए गए हैं। जैसे- जमींदारी उन्मूलन, भूमि पर कृषि को अधिकार दिलाना, बंधुआ प्रथा समाप्त करना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विस्तार करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना, सहकारी आंदोलन का विकास, समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम लागू करना तथा किसानों की ऋण मुक्ति घोषणा आदि ।
  • उपर्युक्त विकासोन्मुख तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत यद्यपि अपनी विकसित अवस्था तक नहीं पहुंच पाया है, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है, जहां आर्थिक विकास के समन्वित एवं योजनाबद्ध प्रयास जारी हैं।

PDF Notes भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप

नीचे “भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप” – Notes PDF है जो PDFinHindi.in द्वारा तैयार किया हुआ है ।

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