कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र – नोट्स प्रारंभिक प्रतियोगिता परीक्षा के लिए

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कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र नोट्स

महत्व

>> कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। आज भी भारतीय कृषि भारत के सकल रोजगार का आधा, समग्र राष्ट्रीय आय में लगभग 1/6 भाग (15-18%) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगभग 18 प्रतिशत (आयात में लगभग 6% तथा निर्यात में लगभग 12%) का योगदान करती है। यह देश की अधिकांश जनसंख्या की आश्रयस्थली है।

भारतीय कृषि की विशेषताएं

>> भारतीय कृषि अभी भी काफी पिछड़ी अवस्था में है। आज भी किसान अवैज्ञानिक विधि से कृषि कर रहे हैं। भारत में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता ( उत्पादन प्रति हेक्टेयर) काफी कम है। भारत में कृषि में बड़ी मात्रा में प्रच्छन्न बेरोजगारी पाई जाती है, जो किसानों में गरीबी के प्रमुख कारणों में से एक है। आज भी भारतीय कृषि में अनिश्चितता व्याप्त हैं, जिस कारण मौसम अच्छा होने पर फसल अच्छी होती है, जबकि मौसम के प्रतिकूल होने पर फसल भी खराब हो जाती है। छोटी जोतें भी भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषता हैं।

>> सकल जोतों का 68.45 प्रतिशत सीमांत जोत (1 हेक्टेयर से कम) से कम है तथा 17.62 प्रतिशत एक से दो हेक्टेयर की लघु जोतें हैं। > इस तरह लगभग 86.07 प्रतिशत जोतें 2 हेक्टेयर से कम हैं।

भारत में जोतों का वितरण(कृषि संगणना – 2015-16)
1. सीमांत जोत (0-1 हेक्टेयर)68.45%
2. लघु जोत (1-2 हेक्टेयर)17.62%
3. मध्यम जोत (2-10 हेक्टेयर)13.35%
4. वृहद् जोत (10 हेक्टेयर से अधिक)0.57%

भारत में भूमि सुधार

>> स्वतंत्रता के बाद भूमि बंदोबस्ती व्यवस्था को सुधारने तथा किसानों के हितों को संरक्षित करने एवं उन्हें कृषि हेतु प्रेरित करने के लिए अधिनियम बनाकर भूमि सुधार कार्यक्रम लाए गए।

>> उद्देश्य

1. ऐसे भू-संबंध विकसित करना जहां खेती करने वाले ही वास्तविक मालिक हों।

>> कार्य

1. मध्यस्थों का उन्मूलन – इसके तहत जमींदारी या उस जैसी सभी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया तथा भूमि के संबंध मे किसानों का सीधे सरकार से संपर्क हुआ ।

2. भू-व्यवस्था में समस्त बाधाओं को दूर करना जिससे शोषण रुक सके।
में किसानों का सीधे सरकार से संपर्क हुआ।

2. कास्तकारी सुधार – इसके अंतर्गत लगान का नियमन किया गया कास्त अधिकारों को संरक्षित किया गया तथा कास्तकारों को भूमि का मालिकाना हक दिलाया गया।

3. कृषि का पुनर्गठन – इसके अंतर्गत कृषि भूमि का पुनर्वितरण किया गया। अधिकतम भू-धारकता का निर्धारण कर अतिरिक्त भूमि, भूमिहीनों में बांट दी गई।

>> अतिरिक्त चकबंदी के माध्यम से छोट-छोटे चकों को मिलाकर बड़े चक बनाए गए, जिससे उन पर वैज्ञानिक कृषि की जा सके। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी कृषि को भी प्रोत्साहित किया गया।

हरित क्रांति

>> हरित क्रांति भारत में कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में तीव्र वृद्धि लाकर भारत को खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने हेतु अनेक कार्यक्रमों का एक समुच्चय था। अमेरिकन (U.S.A) के एक वैज्ञानिक नार्मन बोरलॉग ने बीजों पर अनुसंधान कर अधिक उत्पादकता वाले बीजों (HYV) की खोज की। इन बीजों को उचित सुविधाएं एवं संरक्षण मिलने पर इनसे काफी अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त किया जा सकता था। इसी कारण बोरलॉग को हरित क्रांति का जनक माना जाता है। भारत में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले एम. एस. स्वामीनाथन ने मैक्सिको की पद्धति को भारत में भी अपनाने पर बल दिया तथा भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखी। हरित क्रांति एक पैकेज कार्यक्रम था, जिसके अंतर्गत उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV) को उर्वरक एवं सिंचाई के माध्यम से पोषण दिया गया तथा कीटनाशकों के माध्यम से इसे संरक्षित किया गया। इसके अतिरिक्त कृषि को आधुनिक एवं वैज्ञानिक बनाने हेतु कृषि में मशीनीकरण को भी बढ़ावा दिया गया।

>> प्रायोगिक तौर पर वर्ष 1960-61 में गहन कृषि जिला कार्यक्रम के तहत इसे अपनाया गया तथा 1966 से इसे पूरे देश में लागू किया गया। द्वितीय हरित क्रांति में फसलों के दायरे तथा क्षेत्रों में वृद्धि के साथ-साथ कृषि पद्धति को सम्पोषणीय बनाने हेतु कार्बनिक कृषि को अपनाने पर जोर दिया गया है। इसमें पूर्वी उत्तर भारत सहित अनेक ऐसे क्षेत्रों पर फोकस किया गया है जहां संभाव्यता तो हैं, परंतु हरित क्रांति सफल नहीं हो पाई थी। इसमें दलहन जैसी फसलों के उत्पादन पर भी फोकस किया गया है।

कृषि वित्त

>> कृषि वित्त की आवश्यकता अलग-अलग समस्याओं के लिए होती है। अल्प अवधि में कृषि आगतों (Inputs) के लिए अल्पवधि ऋण, (15 माह से कम) मशीनें आदि खरीदने हेतु मध्यवधि ऋण (15 माह 5 – वर्षों हेतु) तथा भूमि स्थायी सुधार करने, बड़ा निवेश करने आदि जैसी जरूरतों के लिए 5 वर्ष से अधिक अवधि के लिए दीर्घावधिक ऋणों की आवश्यकता होती है।

कृषि वित्त के स्रोत

1. संस्थागत स्रोत

संस्थागत स्रोतों में कृषि वित्त की सर्वोच्च संस्था कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) है। इसकी स्थापना वर्ष 1982 में की गई थी। यह प्रत्यक्ष तौर पर ऋण न देकर कृषि ऋण देने वाली संस्थाओं का विनियमन करती है।

2. गैर-संस्थागत स्रोत

महाजन / साहूकार, मित्र / संबंधी जमींदार, व्यापारी आदि। स्वतंत्रता के समय इनकी भूमिका काफी अधिक थी।

>> कृषि वित्त के संस्थागत स्रोतों में वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक तथा सरकार हैं।

>> नाबार्ड की वार्षिक रिपोर्ट, 2020-21 के अनुसार, वर्ष 2022 में कृषि वित्त में सर्वाधिक लक्षित योगदान वाणिज्यिक बैंकों ( 73%) का है। इसके बाद सहकारी बैंकों (14%) एवं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (13%) का स्थान है।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

> क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना वर्ष 1975 से शुरू हुई। इन बैंकों में 50 प्रतिशत पूंजी केंद्र सरकार की, 35 प्रतिशत पूंजी किसी वाणिज्यिक बैंक (Sponcer Bank) तथा 15 प्रतिशत पूंजी संबंधित राज्य सरकारों की लगी होती है। यह ग्रामीण वित्त हेतु समर्पित संस्थान है।

सहकारी बैंक

> सहकारी बैंक तीन स्तरीय होते हैं-

1. राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक

2. जिले स्तर पर केंद्रीय सहकारी बैंक

3. स्थानीय स्तर पर प्राथमिक सहकारी साख संगठन –

→ राज्य सरकारी बैंक उपभोक्ताओं से सीधे जुड़े नहीं होते हैं, बल्कि यह शेष दोनों स्तरों के बैंकों का विनियमन करते हैं तथा इनका पुनर्वित्त पोषण करते हैं।

→ नोट- कृषि में दीर्घकालीन ऋण भूमि विकास बैंकों द्वारा दिया जाता है।

PDF कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र नोट्स

नीचे “कृषि एवं कृषि संबद्ध क्षेत्र” – Notes PDF है जो PDFinHindi.in द्वारा तैयार किया हुआ है ।

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